Wednesday, January 6, 2010

'घबराए' हुए चरमपंथियों ने क़हर ढाया

वुसतुल्लाह ख़ान | मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009, 19:25 IST

(लेखक BBC HINDI के वारिष्ट पत्रकार हैं यह ब्लॉग उनके संग्रह मे से लिया गया है )

आत्मघाती चाहे मिलेशिया बैरेक, पेशावर के ख़ैबर बाज़ार या इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय में फटे, बारूदी ट्रक चाहे मैरियट इस्लामाबाद या पर्ल कॉंटिनेंटल होटल में घुसे, कमांडो स्टाइल आतंकवादी एक्शन मनावाँ पुलिस केंद्र और श्रीलंकाई टीम के ख़िलाफ हो, सरकारी वक्तव्य एक ही होता है.

"आतंकवादी घबरा गए हैं और बदहवासी में यह आक्रमण अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए कर रहे हैं. आतंकवादियों को अच्छी तरह मालूम है कि अब उन के गिर्द सुरक्षाबलों का घेरा तंग हो चुका है. पूरा देश उन के ख़िलाफ उठ खड़ा है. इसलिए उन की यह कार्रवाईयाँ बुझे हुए चराग़ की आख़री भड़कती हुई लौ हैं. उन से घबराना नहीं चाहिए, ऐसे आक्रमण अभी और भी होंगे लेकिन आतंकवाद को पूरी तरह जड़ से उखाड़ दिया जाएगा."

यदि ऐसे सरकारी वक्तव्यों पर यक़ीन कर लिया जाए तो फिर जीएचक्यू रावलपिंडी पर होने वाला हमला समझने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए. यानी दर्जन भर आतंकवादियों ने एक महीने पहले इस्लामाबाद के करीब आवान टाउन में "घबरा" कर एक घर कराए पर लिया.

बीस पच्चीस दिन तक "बदहवासी" के आलम में घटनास्थल के नक़्शे बनाए और जीएचक्यू का सर्वेक्षण किया. "इंतेहाई कायर" हो कर सैन्य वरदियाँ पहनीं और "दहशतज़दा" हो कर एक मोटर साईकल और सुज़ूकी वैन में जीएचक्यू की दो सुरक्षा चौकियाँ पार कीं और कांपते हाथों से दो ग्रेनेड फेंक कर छह सैन्य अफसरों और जवानों को मार दिया.

इस दौरान आतंकवादियों के कुछ साथी भी मारे गए. यह दृश्य देख कर बाक़ी आतंकवादियों के "हाथ पावँ फूल गए" और उन्हों ने दो फौजी इमारतों में घुस कर चालीस के लगभग लोगों को उन्नीस घंटे केलिए बंधक बना लिया.

आतंकवादियों की इस "बदहवासाना दनदनाहट" पर सरकारी तसल्लियाँ सुन कर मुझे वह कहानी याद आ रही है कि एक हकीम साहब के पास डायरिया का मरीज़ आया.

हकीम साहब ने कहा यह गोलियाँ इस्तेमाल करो इंशाअल्लाह फ़ायदा होगा. हिकमत में चूँकि मर्ज़ को दबा कर नहीं बल्कि उभार कर ख़त्म किया जाता है इसलिए दवा के इस्तेमाल से अगर और दस्त आएँ तो घबराना नहीं.

दो दिन बाद मरीज़ का बेटा हकीम साहब के पास आ कर शिकायती लहजे में बोला कि अब्बा को तो दवा के इस्तेमाल के बाद इतने दस्त आए हैं कि चारपाई से लग गए हैं. हकीम साहब ने कहा, "घबराओ नहीं दवा अपना असर कर रही है और मर्ज़ बाहर निकाल रही है, अभी दस्त आएँगे फिर फ़ायदा दिखना शुरु हो जाएगा".

तीन दिन बाद मरीज़ का बेटा फिर हकीम साहब के पास आया यह बताने के लिए कि अब्बा इंतक़ाल फ़रमा गए हैं. हकीम साहब ने एक आह भरते हुए कहा, "मरना तो एक दिन हर एक है. शुक्र है दस्त बंद हो गए".

Friday, December 25, 2009

मजाक !!

मजाक !!ये शब्द सुन के ही दिल हल्का हो जाता है लेकिन आपको बता दें की इस शब्द का प्रयोग बहुत प्रकार से हो सकता है| एक मजाक वो होता है जो दिल बहलाता है एक मजाक वो होता है जो किसी का अपमान करता है मगर ये मजाक आपका दिल दहला सकता है|

चलिए इस 'मजाक' का पूरा नाम आपको बताता हूँ| इसका पूरा नाम है 'कसाब का मजाक' और ये मजाक उसने किया है हमारे देश के कानून के साथ| और कानून की कोई छोटा-मोटा नहीं बल्कि आतंकवाद निरोधक कानून |

अरे आप इसे मजाक समझ रहे हैं क्या?? आपको इसके परिणाम बता दूं तो आपको इसकी गंभीरता का एहसास होगा| अजी आतंकी तो देख देख के ताली बजा रहे होंगे इस तमाशे को|

वैसे हमारे लिए ये कोई नई बात तो नहीं है| संसद पर हुए हमले को हम शायद भूल चुके हैं और शायद यह भी की मुख्य साजिशकर्ता अजहर का फैसला आना अभी भी बाकी है|

अगर आप एक आम आदमी हैं तो कोर्ट कचहरी का नाम सुनते ही आपका हाजमा ख़राब हो सकता है, रक्त-चाप बढ़ सकता है और आप पंडितों के चक्कर लगाना शुरू कर देंगे| इतना भय खाता है एक आम आदमी 'कानून' के नाम से!! और आतंकवाद निरोधक कानून तो इतने कड़े होते हैं की अगर कोई निर्दोष आदमी गलती से इसमें फंस गया तो आजीवन संघर्ष ही करता रहेगा|

लेकिन कसाब भरी अदालत मे पूरी दुनिया के सामने झूट बोलता है, अपने बयान बदल देता है, पहले कही गयी बात से साफ़ मुकर जाता है| क्या मतलब लगायें इसका? इसके पीछे कौनसी साजिश छुपी है?

मुझे तो लगता है की आतंकवादी सोचते होंगे की बहुत हो गया जिहाद; मरने से क्या फायदा, हम तो जिंदा रहके ही भारत को ज्यादा नुकसान पंहुचा सकते हैं और ये हमें फांसी देंगे भी नहीं|

चलिए कोई नहीं अभी तो हमारे पास गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोज़गारी जैसे दर्ज़नों समस्याएं हैं, ये कसाब कौनसे खेत की मूली है! देख लेंगे इसको भी

जाते जाते एक गाना याद आ रहा है "जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं"

Love Marriage Vs Arrange Marriage

बीते एक दशक मे भारतीय समाज मे बहुत कुछ बदल गया है | इतना बदलाव शायद किसी भी दशक मे नहीं आया होगा और इन्ही मे से एक बदलाव है प्रेम विवाह की बढती हुई संख्या | हमारी मित्र मंडली मे भी इस विषय पे बहुत बात की जाती है|इसी सब के बीच मै मैं सोचने लग जाता हूँ की क्या सही होगा |

एक मित्र का कहना है की शादी तो एक जुआ है अंतर बस इतना है की प्रेम विवाह मे आप दांव खेलते है तो arrange मे आप blind खेलते हैं यानि की अपने घर वालों पे भरोसा करते हैं | लेकिन जुआ तो जुआ ही है इसमें हार जीत का कोई भरोसा नहीं | इसमें तो किस्मत चलती है किस्मत |

यहाँ पे arrange marriage वाले रिश्तों की दुहाई देते हैं | कहते हैं की यही तो हमारी परंपरा है और किसी के माँ बाप बुरा थोड़े ही चाहेंगे, उनके बाल धूप मे थोड़े ही सफ़ेद हुए हैं आदि आदि |

यहाँ पे मै ये बता दूं की अभी तक मैंने बिलकुल एक निष्पक्ष विचार रखा है अभी अपनी भावनाये इसमें सम्मिलित नहीं करी हैं लेकिन मै वो भी जरुर लिखूंगा क्योंकि ये ब्लॉग तो है ही इसी लिए |

वैसे आजकल की नयी पीढ़ी को तो शादी के नाम से परहेज़ ही है | affair तो हर दुसरे लड़के/लड़की का होता है लेकिन शादी के नाम पे लोग नाक भौं सिकोड़ लेते हैं | क्या आपको नहीं लगता की शादी आपकी ज़िन्दगी का एक ऐसा फैसला है जिसपे आपका ही नहीं आपके परिवार का भी भविष्य निर्भर करता है? क्या समाज के टूटते हुए ढांचे को बचाने के लिए हमें career पे नहीं बल्कि इस बात पे भी ध्यान देना होगा की हमारा जीवनसाथी कैसा हो?

मेरे विचार मै तो आजकल प्रेम विवाह केवल नाम का ही प्रेम विवाह होता है | प्रेम वास्तविकता मै क्या होता है ये तो केवल कुछ उम्दा फिल्मो मै ही दीखता है | यहाँ पे कुछ अपवाद जरुर शामिल कर लीजिये लेकिन दुःख की बात ये है की उन अपवादों की संख्या इतनी कम हो चुकी है वो उनको हमें 'अल्प-संख्यक' की जगह अपवाद कहना पड़ रहा है |

देखिये ना पहले कहते थे की वो एक दूसरे से प्यार करते हैं| फिर कहाँ जाने लगा की उनका affair है | और आजकल तो 'सेटिंग' से लेके 'टांका' और न जाने क्या क्या घटिया शब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं| वो इसलिए की इस रिश्ते की इज्ज़त आजकल कम होती जा रही है और वो भी उनके कारण जिनके बीच मै ये रिश्ता होता है |

उन लोगों की मै बहुत इज्ज़त करता हूँ जो आज भी सच्चा प्यार करते हैं | बहुत अच्छा लगता है ऐसे जोड़ों के देख के|

बस ज्यादा नहीं लिखूंगा क्योंकि मुझे लिखना आता भी नहीं है बस आप लोगों से ये अपील है की मुझे जरुर सुझाव दें की आपको क्या लगता है की love marriage और arrange marriage किसको आप बेहतर समझते हैं?

इसी बहाने आपके यानि की नयी पीढ़ी के विचार भी जानने को मिलेंगे |

बस ये मत पूछिए की मुझे शादी की इतनी चिंता क्यों हैं ? अरे भाई social आदमी हैं हम भी |

regards
VINEET KUMAR SHARMA